Monday, November 22, 2010

किशोर के साथ नारी जागरण की संपादकीय टीम

विगत दिनों वाराणसी से प्रकाशित नारी जागरण पत्रिका के संपादक मंडल के सदस्यों (श्रीमती मंजू सिंह, श्रीमती श्रीवास्तव, मीना चौबे एवं प्रेरणा दूबे) का दिल्ली आगमन हुआ। तब उन्होंने हमें नारी जागरण का नया अंक भेंट किया। उसी अवसर पर लिए गए चित्र की एक झलक।

Sunday, November 21, 2010

पोस्टर प्रदर्शनी खरी-खरी का आयोजन




पिछले दिनों बेलगाम (कर्नाटक) में मेरी जन चेतना कार्टून पोस्टर प्रदर्शनी खरी-खरी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर देश की अनेक विभूतियों को विभिन्न सम्मानों से नवाजा गया। मुझे भी राष्ट्रीय साहित्य भूषण सम्मान प्रदान किया गया।

Monday, November 15, 2010

मेरे हिस्से की धूप












कभी-कभी मैं सोचता हूँ
क्यों किसी के हिस्से की धूप
किसी और के आंगन में उतर जाती है
और क्यों किसी पात्र व्यक्ति के
हिस्से की खुशियाँ
कोई अपात्र व्यक्ति लूट ले जाता है।

एक मज़दूर जो रात-दिन करता है मेहनत
और तैयार करता है एक बंगला न्यारा
क्यों उसे उसमें नहीं मिलता है
एक रात बिताने का भी मौका।

क्यों कोई व्यक्ति अपने जिस्म का
हिस्सा समझकर जिसकी करता है हिफाज़त
सालों साल
वर्षों जिसे चाहता है, पूजता है
और जन्म जन्मान्तर तक
साथ रहने की लालसा लिए है जीता
एक दिन अचानक क्यों वह बना दी जाती है
किसी और के घर-आँगन की तुलसी
बगैर यह जाने
कि उस आँगन की हवा,
वहाँ का पानी और वहाँ की मिट्टी
उसके माफिक है भी या नहीं।

यदि सभी को अपने-अपने हिस्से की घूप,
मेहनत का फल, हिस्से की खुशी
और प्यार मिले तो इसमें भला क्या बुराई है।

कुछ लोग कहते हैं,
जिसके हिस्से या जिसके भाग्य में
जो चीज़ लिखी होती है वही
उसके हिस्से में आती है।
किसी के चाहने या न चाहने से
इस पर कोई फर्क नहीं पड़ता है,
यही ईश्वर का विधि विधान है।

पर मैं इससे सहमत नहीं।
ईश्वर तो सर्वशक्तिमान, दयालु
और सबका भला चाहने वाला है।
उसकी नज़र में तो सभी के सुख-दुख
उनकी अपनी मेहनत और
कर्मों के अनुसार ही होने चाहिए।

वह भला क्यों चाहेगा
कि एक ग़रीब व्यक्ति
जो रात-दिन करता है मेहनत
सिर्फ भाग्य के चलते
उसकी थाली की रोटी बन जाए
किसी और के मुंह का निवाला ।

और एक जैसे मन के दो
विपरीत लिंगी व्यक्ति
जो सदा समर्पित रहते हों
एक-दूसरे के लिए और जो समझते हों
सदा अपने आपको एक-दूसरे के लिए बना
क्यों वह पलक झपकते ही
कर दिये जाएं एक दूसरे से अलग
और डाल दिए जाएं
किन्हीं औरों की झोली में

चाहे उन्हें उनकी ज़रूरत हो भी या नहीं।

Thursday, November 4, 2010

राजभाषा संगोष्ठी व पुरस्कार वितरण समारोह का आयोजन



















नई दिल्ली। यहॉं विस्तार निदेशालय में राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं सरकारी कामकाज में हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा देने के उद्वेश्य से एक राजभाषा संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें बोलते हुए संगोष्ठी के मुख्य अतिथि एवं भारत सरकार के पूर्व संयुक्त सचिव श्री बुध प्रकाश ने सरकारी कामकाज में हिन्दी के प्रयोग को बढ़ाने पर ज़ोर देते हुए सभी कर्मियों से अपना सरकारी काम मौलिक रूप से हिन्दी में करने का आवाह्न किया। उन्होंने इसके लिए अनुवाद पर निर्भरता कम करने की सलाह भी दी। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए विभाग के अपर आयुक्त श्री वाई आर मीना ने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि निदेशालय में हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए समय-समय पर राजभाषा हिन्दी के इस तरह के कार्यक्रम चलते रहते हैं। और इनसे यहाँ के अधिकारी एवं कर्मचारीगण लाभान्वित होते रहते हैं। इस अवसर पर निदेशक (विस्तार प्रबंध) डा. आर. के. त्रिपाठी ने भी सरकारी कार्यालय में हिन्दी के प्रयोग को लेकर अपने उद्गार प्रस्तुत किए। इससे पूर्व संगोष्ठी के प्रारम्भ में कार्यालय के सहायक लेखा अधिकारी श्री नन्द कुमार ने सुमधुर सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। इस अवसर पर राष्ट्रभाषा हिन्दी एवं विभिन्न सामाजिक व राष्ट्रीय विषयों पर एक काव्य गोष्ठी का आयोजन भी किया गया। इसमें देश के अनेक नामीगिरामी कवि व शायरों ने अपनी सारगर्भित रचनाएं प्रस्तुत की। इनमें शामिल रहे सर्वश्री बागी चाचा, वीरेन्द्र कमर, डा. रवि शर्मा, अनुराग, रसीद सैदपुरी एवं अंजू जैन। गोष्ठी का सफल संचालन श्रीमती ममता किरन ने किया। इस अवसर पर विगत दिनो संपन्न हिन्दी पखवाड़े के दौरान राजभाषा हिन्दी की विभिन्न प्रतियोगिताओं में सफल रहे अधिकारियों व कर्मचारियों को अतिथियों द्वारा पुरस्कार भी प्रदान किया गया। इन समस्त कार्यक्रमों का संचालन कार्यालय के सहायक निदेशक (राजभाषा) श्री किशोर श्रीवास्तव ने किया। अंत में संयुक्त निदेशक श्री पी. एस. आरमोरीकर ने सभी अतिथियों के प्रति निदेशालय की ओर से आभार व्यक्त किया।

- प्रस्तुतिः इरफान सैफी राही (पत्रकार), नई दिल्ली मो। 9971070545

Tuesday, September 21, 2010

माँ तो आखिर माँ होती है.....

बात पिछले साल के इसी माह की है। दफ्तर और घर के अनेक महत्वपूर्ण काम निपटाकर हम बेहद रिलेक्स मूड में थे। हमारा दशहरे की छुटिटयों में झॉंसी अपने घर जाने का कार्यक्रम था। उन दिनों दो-चार दिन की छुट्टियों में भी हमारा प्रायः झाँसी जाने का कार्यक्रम बन ही जाया करता था। इसका मुख्य कारण वहाँ पर मेरी माँ, भाई, बहनों और अन्य अनेक बचपन के मित्रों और ढेर सारे रिश्तेदारों का होना है। वैसे भी दिल्ली जैसे भागमभाग वाले मेट्रोपोलिटन शहरों में सच्चे प्रेम और आत्मीयता की कमी झेलते रहने वालों को दो-चार दिनों के लिए भी अपने गाँव-शहर व लोगों के बीच रहने का अवसर मिल जाए तो उसे कम से कम साल भर की ऊर्जा मिल ही जाती है। पिछले वर्ष इन्हीं दिनों मेरी माँ (श्रीमती मिथलेश श्रीवास्तव) काफी समय से कुछ अस्वस्थ चल रही थीं। जब उनकी बीमारी कुछ बढ़ जाती थी तो उन्हें उचित देखभाल के लिए पास के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती करा दिया जाता था। उन दिनों भी उन्हें सामान्य रुटीन चेकअप के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अतः हम मुख्य रूप से उनसे मिलने के मकसद से ही झाँसी जा रहे थे। हमारे परिवार में तीन भाई और तीन बहनें हैं। हमारे बीच आपसी प्रेम और सद्भाव की एक मिसाल कायम रही है। माता-पिता से हमारा व उनका हमसे तो कुछ इस तरह का लगाव था कि बाल-बच्चेदार होने के बावजूद अभी भी हममें प्रायः उनके साथ चिपक कर सोने या उनके हाथ से कुछ खाने की होड़ लगी रहती थी। शायद ही ऐसा कोई किस्सा रहा हो जो हम उनके साथ शेयर करना न चाहते हों। चाहे साहित्य का क्षेत्र हो या गीत, संगीत का हमें उनसे जीवन भर प्रोत्साहन मिलता रहा। हमारी बनाई कहानी, कविताएं या पत्रिका के अंक उनकी आँखों के सामने से होकर अवश्य गुजरते थे। हमसे व हमारे मित्रों आदि से गीत आदि सुनने का भी उन्हें बहुत शौक था। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि सिलाई, कढ़ाई, बुनाई और पाक कला के अलावा उनकी इन कलाओं में भी गहरी रुचि थी। माँ-बाबू जी की डायरियों में प्रायः हमें उनकी लिखी कहानी, कविताएं देखने को मिल जाती थी।
दो वर्ष पहले पिताजी के गुजर जाने के बाद माँ अपने जीवन में बहुत कुछ शांत रहने लगी थीं। जीवन भर हम बच्चों और कुछ नाते-रिश्तेदारों आदि की बेहतरी में लगे पिताजी न कभी हमारी माँ के लिए कुछ खास कर पाए थे और न ही अपने लिए एक घर बना पाए थे। अपने अंतिम समय में पिताजी दिमागी रूप से कुछ अस्वस्थ भी हो चले थे अतः मॉं की निगरानी में ही उनका एक-एक दिन गुजरता था। पिता जी भी अपने होशो-हवाश में मॉं का पूरा ध्यान रखते थे। जब कोई उनकी ज़्यादा सेवा करता तो वह उसे डांटने के अंदाज़ में कहते, ‘मेरा नहीं उनका (माँ) का ध्यान रखो, वो हैं तो सब कुछ है।’ शायद यह निस्वार्थ प्रेम और समर्पण ही था जिसने पिताजी के जाने के बाद माँ को एकदम से तोड़ कर रख दिया था। बहू-बेटे और पोते-पोतियों आदि की भीड़ के बावजूद माँ अपने आपको काफी अकेला महसूस करने लगी थीं। ऐसा उन्होंने एक दिन बातों ही बातों में मुझसे कहा भी था। हम नहीं समझ पाये थे कि भरे पूरे परिवार के बावजूद मात्र एक पति, जो जीवन के अंतिम समय में अपनी मानसिक स्थिति के चलते माँ का पूरी तरह से साथ भी नहीं दे पाते थे और उनके कभी-कभी के व्यवहार व स्वास्थ्य कारणों से अक्सर घर में कुछ परेशानी भी खड़ी हो जाती थी, के न रहने मात्र से माँ को इतना अकेलापन क्यों महसूस होता है। शायद हमारे और उनकी पीढ़ी के बीच के स्त्री-पुरुष सबंधों को समझ पाने का यही फर्क था। हमारी आज की पीढ़ी ने जिन संबंधों को समझौते का रूप देकर एक दूसरे की आवश्यकता पूर्ति का साधन मात्र समझ लिया है और उसे पूरी तरह से व्यवसायिक सांचे में ढाल दिया है, वह भला माँ की पीढ़ी के स्त्री-पुरुष संबंधों को कैसे समझ सकती है। पिताजी के गुजर जाने के बाद माँ की खाने-पीने की चीज़ों से भी अरुचि सी हो गई थी और वह अपना सामान्य भोजन भी ठीक से नहीं लेती थीं। इसी बीच उन पर शुगर, ब्लडप्रेशर आदि जैसी बीमारियों का शिकंजा भी कसता चला गया। इन सबके बावजू़द वह अपनी सेहत के प्रति कभी सचेत नहीं हुईं। और अंततः पिताजी के न रहने के ग़म को अपने सीने में दबाए हुए 28 सितंबर,2009 को ठीक दशहरे वाले दिन हम सबको छोड़कर किसी नई दुनियॉ की ओर कूंच कर गईं। माँ के गुजर जाने के बाद जब हम उनकी डायरी के पन्ने पलट रहे थे तो उसमें उनकी लिखी यह पंक्तियां हमें नजर आई जो उन्होंने बाबूजी के निधन के पश्चात लिखी थी। इससे उनकी बाबूजी के प्रति प्रेम और समर्पण आदि की एक झलक मिलती है-
‘कहां चले गये आप, अपना घर परिवार सब छोड़ के
कहां विलीन हो गये, हम सबको रोते बिलखते छोड़ के।
सात जनमों की कसम खाकर, हमको अपने घर लाये थे।
कितने लगन और निष्ठा से अपना कर्तव्य निभाए थे।
क्या भूल हो गयी हम सबसे, जो चले गये रिश्ता तोड़ के।
कहां विलीन हो गये, हम सबको रोते बिलखते छोड़ के।
अगर भूल हो गयी हो हम सबसे, तो उसे क्षमा कर देना।
झुका रहेगा सर चरणों में उसे स्वीकार कर लेना।
सपनों में नहीं दर्शन देते, ऐसे गये मुंह मोड़ के
कहां विलीन हो गये, हम सबको ..........’
माँ ने बेटी-बेटे का भेद किए बगैर हम छह भाई-बहनों को एक समान रूप से पाला-पोसा था। ट्रांस्फरेबुल नौकरी के चलते पिताजी के अक्सर घर से दूर होने की स्थिति में भी माँ ने कभी साहस नहीं खोया और न ही हमारी पढ़ाई या लालन-पालन में कभी कोई कसर रखी। अपने सुख-दुख की परवाह न करते हुए सबके सुख-दुख में बराबर का शरीक होना और सबकी मदद करते रहना उनकी फितरत में शामिल था। वह सुख के क्षणों में या किन्हीं परेशानियों के चलते किसी भी बच्चे के बुलावे पर पैसे-रुपए व घर-द्वार की परवाह किए बगैर और रुग्ण शरीर के बावजू़द तुरंत उसके पास आ जातीं और महीनों साथ रहतीं। परन्तु अपनी नौकरी और घर-परिवार की समस्याओं में व्यस्त रहने के कारण हम उनके अंदर पल रही बीमारी, उनके एकाकीपन और उनकी आवश्यकताओं को शायद ज़्यादा करीब से नहीं महसूस कर पाए थे।
जब मैं दिल्ली में नौकरी के चलते और अविवाहित होने के कारण अकेला एक किराए के मकान में रहता था। मेरी बीमारी की खबर सुनकर माँ तुरन्त मुझे देखने चली आई थी। वह लगभग महीने भर मेरे पास रही थीं। उन दिनों बीमारी व किन्हीं अन्य कारणों से मेरे पास पैसों की समस्या हो गई थी। माँ के जाते-जाते मेरी जेब पूरी तरह से खाली हो चुकी थी। और मुझे यह चिंता सताए जा रही थी कि तन्ख्वाह मिलने तक यानी अगले 10-12 दिनों तक मेरा खर्च कैसे चलेगा। परदेश में मैं किसी से उधार भी नहीं ले सकता था। उस दिन जब मैं माँ को झाँसी रवाना करने के लिए ट्रेन में बैठाकर घर लौटा और अपने दवा-दारू आदि पर हुए खर्चों का हिसाब अपनी एक डायरी में लिख रहा था। तो अचानक मेरी नज़र उसमें रखे एक लिफाफे पर पड़ी। लिफाफे के अंदर कुछ रुपए रखे थे और एक कागज पर माँ की लिखी ये चंद लाइनें-‘बेटा मेरे आने से व तुम्हारी बीमारी पर बहुत पैसे खर्च हो गए होंगे, इसलिए इन पैसों से अपना काम चला लेना। कसम है बुरा मत मानना और इसे वापस मत करना।’ मैं उस दिन बहुत रोया था।मुझे समझ में नहीं आया था कि माँ ने मेरी आर्थिक स्थित को कैसे भांप लिया था जबकि मैंने इसका उन्हें कभी आभाष नहीं होने दिया था। माँ की लिखी वह चिट्ठी आज भी कभी मैं देखता हूं तो मुझे रोना आ जाता है।
व्यवसायीकरण की अंधी दौड़ में दौड़ते जब हम आज के समाज और उसके नए चाल-चलन को देखते हैं तो लगता है आगे की पीढ़ी को न अब ऐसे माँ-बाप और न उनका ऐसा प्यार नसीब हो सकेगा। एक-दूसरे के प्रति प्यार, समर्पण और त्याग की कहानियॉं हमें इतिहास के पन्नों में ढूंढ़नी पड़ेगी। पति-पत्नी के बीच के एक-दूसरे की आवश्यकताओं और स्वार्थ तक सिमट जाने वाले संबंध कल, परिवार और समाज को किस दिशा में ले जाएंगे यह सोच कर ही आज मन सिहर उठता है।
इस माह की 28 तारीख को माँ की पहली पुण्य तिथि है। सो माँ की याद आ गई और मैंने सोचा उनसे जुड़ी कुछ बातों को आप सबके साथ शेयर करूं। मेरे पास आज माँ नहीं है। वे धन्य हैं जिनके पास माँ है....

Wednesday, August 25, 2010

लघुकथाः फर्क


वह दोनों युवक लेडीज सीट पर जमे बैठे थे। अचानक एक बस स्टॉप पर एक औरत गोद में बच्चा लिए गिरती-पड़ती उन दोनों युवकों के पास आकर खड़ी हो गई। युवकों ने उसे देखा पर नज़रें झुकाए बैठे रहे।
महिला ने उनसे निवेदन किया, ‘भैया, गोद में बच्चा है, खड़ा नहीं हुआ जा रहा है, ज़रा लेडीज सीट खाली कर दो।’
परन्तु उन दोनों युवकों पर उस महिला के निवेदन का कोई असर नहीं हुआ और वे उसकी तकलीफ से बेखबर उसी तरह से चुपचाप बैठे रहे। अचानक भीड़ में से एक बुजु़र्ग व्यक्ति की आवाज़ आई, ‘बिटिया, यहॉं आकर मेरी सीट पर बैठ जाओ।’ और फिर वह महिला उसी ओर चली गई। बुज़ुर्ग व्यक्ति ने उस महिला के लिए अपनी सीट खाली कर दी थी। जब बस अंतिम स्टाप पर रुकी तो अनायास ही उन युवकों की नज़र उस बुज़ुर्ग व्यक्ति पर पड़ी, जो बस से नीचे उतरने के लिए अपनी बैसाखी संभाल रहा था।

Thursday, July 8, 2010

Monday, July 5, 2010

व्यंग्यः रिश्ते ही रिश्ते मिल तो लें....

अतिथि तुम कब जाओगे के युग में मेरे एक 50 की उम्र में ही सठियाए से लगने वाले मित्र मुझे पिछले दिनों रिश्ते-नातों का महत्व समझाने बैठ गए। उनको टालने की गरज़ से मैंने पत्नी द्वारा लगातार ड्राइंग रूम के पर्दे की ओट से ऑंखें दिखाए जाने के बावजू़द उनके लिए दो बार चाय की मांग कर डाली। मेरी पत्नी मेरी इस निर्लज्जता और निडरता का जवाब अवश्य देती परन्तु वह इतनी भी बेवकूफ नहीं कि किसी बाहरी व्यक्ति को अपनी असलियत की भनक यूं ही लग जाने दे। मेरी किस्मत भी इतनी भली थी कि मेरे वह मित्र प्याले में बची-खुची चाय को पारिवारिक चीटियों व मक्खियों द्वारा कई-कई बार चूस लिए जाने के बाद भी मेरे घर से हिलने को तैयार नहीं थे। वह तो बाद में पता चला कि उनकी पत्नी मायके गई हुई है वरना तो वह पहले कभी मुझसे मिलने भी आते थे तो खिड़की से झांक कर मिलने में ही परम संतोश का अनुभव कर लेते थे। मैं जब-तक दरवाज़ा खोलकर उन्हें अंदर आने का न्यौता देता, वह ‘अरे, लो... पत्नी का फोन आ गया है..’ कहकर फरार हो जाते।


खैर, यहॉं बात हो रही थी रिश्ते-नातों के महत्व की। मेरे मित्र ने उस दिन बताया कि लोग आजकल रिश्ते-नातों का महत्व भूलते जा रहे हैं। जबकि बिना किसी से कोई रिश्ता गांठे आज आदमी चैन से मर भी नहीं सकता। अब मरने पर अर्थी को कंधा देने की जल्दी सबसे पहले नाते-रिश्तेदारों को ही तो होती है। इस अर्थी देने की बात पर मुझे वह पुराना दिन याद हो आया। उस दिन बारिश के मौसम में जब हम अपने पड़ौसी के दादा जी की अर्थी को लेकर शमशान घाट गए हुए थे तब वहॉं पास की लकड़ी की टाल पर पहले से ही कई लोग लाइन में लगे हुए थे। लकड़ी का दाम तो सबके लिए एक सा ही था परन्तु जान-पहचान के लोगों ने पहले से ही सभी सूखी लकड़ियॉं अपने-अपने लिए निकलवा रखी थीं। यहॉं इस अपने-अपने का मतलब स्वयं के लिए नहीं बल्कि अपने-अपने मृतकजनों के लिए ही समझा जाए।


हां, तो बात जान-पहचान की थी। मेरे पड़ौसी ने लकड़ी वाले से लाड़ दिखाते हुए चाचा, ताऊ, दादा, भैया और न जाने कौन-कौन से अलंकरणों का सहारा लेकर उससे रिश्तेदारी गांठने की कोशिश की परन्तु रिश्ते कोई ऐसे ही थोड़े बन जाते हैं। अब यह कोई राजनीति तो है नहीं कि मौका मिलते ही किसी भी दल से अपना नाता गांठने की मिन्नत करने लगो और दल वाला अपने फायदे के लिए आसानी से उसे स्वीकार भी कर ले। वहां पहले से खड़े एक व्यक्ति ने बताया कि अब-तक वह अपने और अपने पड़ौसियों के दादा, दादी, चाचा-चाची आदि के नश्वर शरीरों को जलाने के लिए यहॉं से बीसियों बार लकड़ियॉं खरीद चुका है। इसी कारण लकड़ी वाले से अब उसका ऐसा रिश्ता बन गया है कि यदि वह बिना मरे ही अपने आपको जलाने के लिए भी उससे लकड़ियॉं मांगे तो वह बिना पैसा एडवांश में लिए उसके लिए लकड़ियों का ढेर लगा देगा। यही नहीं यदि वह तसल्ली से जलना चाहे तो लकड़ी वाला जून की तपती दोपहरी में भी उसके लिए कहीं न कहीं से गीली लकड़ियों का इंतज़ाम कर ही देगा। अब चूंकि मेरे मित्र महोदय का लकड़ी के उस टाल वाले से कोई रिश्ता-नाता नहीं था इसलिए उनके हाथों गीली लकड़ियॉं ही लगीं। उन गीली लकड़ियों के कारण उनके दादा जी के मिट्टी के शरीर को मिट्टी में मिलने में पूर दो दिन लग गए। इस बीच उनके नाते-रिश्तेदार भी इस चिंता में सूखते नज़र आए कि कहीं इस देरी का नाजायज़ फायदा उठाकर दादा जी पुनः जीवित न हो उठें।


अब भला आज के ज़माने में एक ही आदमी की मौत पर बार-बार अपना गॉंव, शहर छोड़कर भागे चले आना इतना आसान भी तो नहीं था, उन सबके लिए। अचानक पड़ौसी के दादा जी की अर्थी से मेरा ध्यान हटा तो मैं यह देखकर घबरा गया कि मेरे मित्र महोदय आधे सोफे पर और आधे ज़मीन पर लटके हुए खर्राटे मारने में मशगूल थे। उनकी इस अदा से मुझे पक्का समझ में आ गया था कि आज लोग रिश्ते-नातों से दूर क्यों होते चले जा रहे हैं। अभी मेरी समझ में कुछ और भी आता इसी बीच मित्र महोदय की नींद अचानक टूटी और वे फिर से रिश्ते-नातों की अहमियत की बांग देने बैठ गए। उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा,‘देखो, रिश्ते-नातों का यह मतलब नहीं कि अपने खून के रिश्तों से ही जीवन भर चिपके रहा जाए। खून के रिश्तों के स्थान पर मुंहबोले रिश्ते कहीं अधिक अहमियत रखते हैं और काम के भी होते हैं। उन्होंने कहा, यदि जीवन में सफल होना है और अपने हर काम को सुचारू रूप से चलाते रहना है तो पुलिस से दोस्ती गॉंठो, नेता से रिश्ते बनाओ, मोहल्ले के गुंडे से नाता जोड़ो और ज़रूरत पड़े तो गधे को भी अपना बाप बना डालो। उन्होंने बतौर उदाहरण अपने एक सगे मित्र का किस्सा सुनाते हुए कहा कि वह अपने ऑफिस में नए बॉस की सख्ती से सदैव परेशान रहता था। जब कभी भी वह ऊर्जा की बचत के लिए अपने चैम्बर की बत्ती बुझा कर नींद में शापिंग मॉल की सैर कर रहा होता था, बॉस उसके टेबुल पर कोई न कोई ज़रूरी फाइल पटक जाते थे। इस बारे में मोहल्ले की मानवाधिकर चाची से ली गई सलाह पर जब उन्होंने काम करना शुरू किया तो मानों उनके दिन ही फिर गए। चाची के कहेनुसार उन्होंने बॉस के परिवार को दो-चार बार घर में दावत पर बुलाया, उनके बच्चों ही नहीं निजी कुत्ते तक को नहलाया, धुलाया और पार्कों में टहलाया। यही नहीं अपनी पत्नी के जन्म दिन पर खरीदी गई महंगी साड़ी तक उसने बॉस की पत्नी को बिना उनका हैप्पी बर्थ डे आए, भेंट कर दी। इन सबसे बॉस और उनके घर वालों से उनका ऐसा नाता जुड़ा कि देखने वाले दॉंतों तले अपनी अच्छी भली उंगलियॉं भी चबा बैठे। उन्होंने इस किस्से को आगे खींचते हुए बताया कि अब उनका दोस्त ऑफिस में ऊर्जा की बचत किए बगैर आसानी से घंटों चैन की नींद सो पाता है।


मित्र के धारावाहिक किस्सों में थोड़ा विराम आया तो मैं रिश्ते-नातों पर नए तरीके से चिंतन करने बैठ गया। निश्चय ही आज जीवन में वही व्यक्ति सफल है जो वक्त देखकर किसी न किसी से अपना रिश्ता गॉंठ बैठा है। एक लेखक अच्छे से अच्छा लिखकर भी क्या करेगा यदि उसके संपादक से अच्छे रिश्ते नहीं होंगे। आगे बढ़ने के लिए आज कर्मचारी को अपने बॉस से, पार्टी कार्यकर्ता को नेता से, चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी को जनता से, अभिनेत्रियों को नग्नता से, विद्यार्थियों को अध्यापक से, डाक्टर को मरीज से, वाहन चालक को ट्रैफिक इंस्पेक्टर से, चोर-उचक्कों को थानेदार से और न जाने किसको-किसको किससे-किससे रिश्ता बनाए रखना पड़ता है। बेशक इन रिश्तों को बनाने के चक्कर में हमारे अपनेे माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी, चाचा-ताऊ आदि जैसे सभी रिश्ते पीछे छूटते चले जा रहे हों। जिनके बिना कभी हमें इस संसार में अपना वजूद ही नहीं दिखाई पड़ता था.

Wednesday, June 16, 2010

नए सपने


अब स्वप्न भी नहीं आते


नीले समुंदर में मछलियों की तरह


अठखेलियॉं करने के


या पक्षियों की तरह पंख फैलाकर


दूर गगन में उन्मुक्त उड़ान भरने के


और या रंग-बिरंगे परिधानों में सजी


परियों के साथ चॉंद पर विचरण करने के।


अब स्वप्न आते हैं भी तो बस


दो जून की रोटी के


मुन्ने की फीस और पत्नी की फटी धोती के


दहेज़ के अभाव में अनब्याही


मुनिया की ढलती उम्र


स्वप्न में भी जगाए रखती है


पूरी रात


नहीं होती अब स्वप्न में भी


कोई दिल बहलाने वाली बात।


बदरंग फाइलों की ढ़ेर


और कड़ी मेहनत के बावजू़द


बॉस की बेवजह गुर्राई ऑंखें


स्वप्न तक पहुच जाती हैं


इस प्रकार दिन भर की थकान


वहॉं भी नहीं उतर पाती है


खेल नहीं पाते हम वहॉं भी


सुख-सुविधाओं की कोई पारी


पीछा नहीं छोड़ती स्वप्न में भी


भूख, ग़रीबी, बेबसी और लाचारी

Tuesday, June 15, 2010

विकल्प

जैसे ही उसे यह खबर मिली कि सरकार ने बाल श्रम पर रोक लगा दी है और अब वह ऐसे बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर विषेश ध्यान देगी, तो उसका चेहरा खिल उठा। वह बीड़ियों का बंडल फर्ष पर ही छोड़कर कंपनी से भाग खड़ा हुआ। घर पहुंचकर जब उसने अपनी विधवा और विकलांग मॉं को यह खबर सुनाई तो एक पल तो वह भी खुषी से फूली नही समाई पर अगले ही पल उसका चेहरा मुरझा गया। जब बेटे ने मॉं से उसके मायूस होने का कारण पूछा तो वह कुछ सकुचाते हुए बोली, ‘बेटे! जब सरकार तुझसे काम छुड़वाकर तुझे स्कूल भेज देगी तो फिर हमारे पेट की आग कौन बुझाएगा?’ कुछ देर तक झोंपड़ी में खामोषी छाई रही। फिर अचानक मॉं खुद ही बोली,‘बेटेे कोई बात नहीं, मैं कोई काम तो कर नहीं सकती पर तुम स्कूल जाते समय मुझेे षंकर जी के मंदिर के बाहर बैठाल दिया करना। वहॉं दिन भर में कुछ न कुछ भीख तो मिल ही जाया करेगी। कम से कम घर का खर्च तो थोडा़-बहुत चल ही जाएगा।’ नहीं मॉं, ‘मेरे जीते जी तू क्यों भीख मांगेगी। पढ़ाई-लिखाई का क्या, पहले तो हमें अपना पेट ही भरना है अतः मैं खुद ही मंदिर पर जाकर बैठ जाया करूंगा। वैसे भी भीख मांगना तो बाल श्रम में आता भी नहीं है।’ और फिर इसके साथ ही वह मंदिर जाने की तैयारी में लग गया।

Tuesday, April 27, 2010